सोमवार, 18 मई 2020

तू बेवफा या मैं?(कविता -संग्रह -"फड़फड़ाती उड़ान !"/कवियत्री -रेखा रुद्राक्षी !),

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तू बेवफा या मैं?

 कभी किसी ने कहा था, वफा मिलती नहीं है!
 हमने उसे वफादार बनके दिखाया!
 फिर उसने कहा, सब मतलबी है दुनिया में!
और मैंने बेमतलब, उसका साथ निभाया!
 उसने कहा, मै तुम्हे ज्यादा वक्त ना दे पाऊंगा!
और मैंने उसके इन्तज़ार में, हर लम्हा बिताया!
 माना, हालातों की वजह से बहुत हारी थी मैं!
पर उसके लिए वक्त से परेशान, 
एक बेचारी थी मैं!
सच कहूँ, तो उसे कभी समझ ही नहीं आया!
कि उसके लिए, 
अपनी हर ख्वाहिश को हारी थी मैं!
उसकी एक मुस्कुराहट के लिए,
उसकी हर अनचाही बात भी मानी थी मैं!
क्या पता, अब कभी उनसे मुलाकात होगी भी या नहीं!
उसका तो हर लम्हा अनमोल था,
पर उससे बात करने के लिए, 
हर पल खाली थी मैं!

- रेखा रुद्राक्षी।


ज़िन्दगी की फड़फड़ाती उड़ान!(कविता -संग्रह -"फड़फड़ाती उड़ान !"/कवियत्री -रेखा रुद्राक्षी !),

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ज़िन्दगी की फड़फड़ाती उड़ान!

 काम-वासना में डूबे, दो जिस्मों का मिलन!
वैवाहिक- जीवन का, वो अद्भुत संगम!
मिलन, जिसमें मेरा जीवन  , अस्तित्व में आया !
माँ के गर्भ में, जो नव-जीवन था लाया! 
बढ़ती रही धीरे-धीरे,अपने जीवन- चरण की और!
तड़पती रही, झटपटाती रही, फड़फड़ाती रही,
की जन्मु और उड़ जाऊँ आसमान की ओर!
देखूँ फिर, ये अद्भुत दुनिया का मेला!
जहा दुनिया की भीड़ में भी, 
हर इंसान था अकेला!
गर्भ में ही रहकर, कई बार कई बाते को झेलती थी मैं!
बेटी पैदा न हो जाए, सबके स्वरों की गूंज को 
सुनती थी मैं!
हां, माँ के गर्भ में कई बार खेलती थी मैं!
पर माँ के दर्द, तकलीफों को भी समझ सकती थी मैं!
नौ महीने का संघर्ष ओर दर्द भी असहनीय!
झटपटाती, फड़फड़ाती रहती माँ, 
पर माँ खुश होती थी!
जब उसके गर्भ में खेलती थी मैं!
जन्म लिया, मैं इस युग में आयी!
उदास चेहरों की आँखों में, नमी थी छाई!
क्या हुआ, क्या हुआ, का शोर बहुत था!
लड़की पैदा हुई, माँ के सिवा ये अफसोस सबको बहुत था!
बचपन से ही जैसे जीवन, संघर्ष बन चुका था!
मैं जन्मी क्यों हूँ, ये सवाल मेरे दिल में, 
घर कर चुका था!
दिल की वेदना, तड़पती रही, झटपटाती रही!
मेरी आशाएं, मेरी उमीदे ,
मेरे अंतर्मन में फड़फड़ाती रही!
समाज के दोगलेपन से, मैं हमेशा घबराती रही!
बेटा, बेटी में अंतर था, 
जमीन- आसमान का, ऐसा क्यों?
माँ की एक कोख से जन्मे थे, 
इस सवाल के जवाब के लिए!
मैं हमेशा तड़पड़ाती और फड़फड़ाती रही!
बीत रहा था मेरा बचपन, 
अल्हड और मतवाला- सा !
बेटी घर से बाहर न निकले, 
बेटा घर का रखवाला था!
चार दीवारी घर है तेरा, मुझे समझाया जाता था!
बेटी है, बेटा ना बन, अपनों से ज्यादा रिश्तेदारों के बीच, मुझे ये पाठ पढ़ाया जाता था!
भरपूर था मुझमे हूनर, कुछ कर दिखलाने का!
माता- पिता के सर को, गर्व से ऊँचा उठाने का!
माँ ने समझा, पिता ने समझा, 
समझा रिस्तेदारो ने!
पर बेटी हूँ, इसलिए आगे बढ़ने ना दिया, 
समाज के ठेकेदारों ने!

२.    छोटी- सी उम्र में ही भेदभाव को समझ चुकी थी!
अपनी तमन्नाओं, ख्वाईशों को मिटता हुआ, 
मैं देख चुकी थी!
सच में दिल के अंदर, एक युद्ध अपने आप से 
चल रहा था!
कब कैसे बदलेगा, ये भेदभाव, बेटा, बेटी के अंतर का!
ये सवाल मेरा दिल, मुझसे हर बार कर रहा था!
पढ़ी चार किताबे मैंने भी, झाँसी की रानी 
और इंदिरा गाँधी की!
एक ने अपना राज्य बचाया, एक ने अपना देश चलाया!
वो भी तो बेटियाँ महान थी, 
हमारे देश की शान थी!
न शरीर रहा, न उसका साथ रहा!
पर आज भी उन बेटियों का नाम,
 इतिहास को याद रहा!
फिर क्यों, मेरे बढ़ते कदमो को रोका जाता है?
क्यों, मुझे पैदा होने से पहले ही, 
मार दिया जाता है?
हां, मैं लड़की हूँ, पर मेरा अपना वजूद है!
जिस कोख से बेटा जन्मे, वो मेरी   माँ ही तो कोख है!
यु हीं तुम स्त्री -जाति को मिटाते जाओगे?
तो ए पुरुष जात, 
किसके गर्भ से अपना वंश चलाओगे?
नारी ग्रहणी, नारी माता,नारी बहन,नारी घर का आधार है!
नारी तेरा नवजीवन, 
फिर नारी कहा से अभिशाप है?
बेटा, बेटी में अंतर था, 
इसलिए टूटते मेरे ख्वाब रहे! 
अब बहू बनी, तो बेटी- बहु में अंतर मिलते नए, 
हमेशा दिल को घाव रहे!
पहले समाज और उनकी रीतियों से 
सतायी गयी!
फिर बहू बनी, 
तो वहा भी मेरी ख्वाइशें जलाई गयी!
सोचा, माँ के घर से बाहर निकलूंगी, बहू बनकर अपनी नई दुनिया बसाउंगी!
बेटी बनकर, जो न कर पायी, बहू बनकर अपने जीवन साथी से, अपने सपने पूरे करवाउंगी!
सपना ये नहीं की, दौलत- शोहरत हो, ज़ेवरों की दुकान हो!
बस, इस काबिल बन जाऊ, की औरों को ही नहीं, मुझे खुद पर भी अभिमान हो!
नित नए सपने संजोती जाती थी, हर एक 
ख्वाइश को बच्चों की तरह समझाती थी!
उड़ान भरूंगी, एक दिन मैं भी, पंछियो को पंख फैला उड़ते देख,आँखे नम मेरी हो जाती थी!
धीरे- धीरे समझ आ गया, मैं तो औरत जात हूँ!
बेटी बनकर, बेटा न बनी, बहू बनकर घर का 
काम किया!
चार दीवारी ने हरदम घेरा, मुझको किसने कब 
मेरा सम्मान किया!
बेटी चरित्रहीन न बन जाए, इसलिए मेरे वजूद को चार दीवारी के अंदर सीमित 
बताया जाता था!
बहू बनकर घर से बाहर न निकलू, इसे लाज शर्म और हया का गहना बताया जाता था!
ऐसा लगा मानो,पुराने पिंजरे से नए पिंजरे को बदल दिया!             
न ख्वाइशे पूरी हुइ, न ख्वाब पूरे हुए!
बेटी से बहू बनी, इन रीतियों ने तो मेरे वजूद का अस्तित्व ही बदल दिया!
क्या है मेरा ,क्या था मेरा, क्या होगा ,
कभी कुछ मेरा?
इसी सवाल में उलझी रहती थी!
बेटी, बहन, पत्नी, माँ के रूप में ,
औरत जीती रहती थी!
जंग खुद से हो गयी जारी थी!
बंद पिंजरे को तोड़ कर, उड़ जाने की तैयारी थी!
अब कोई डर, मुझे झुका नहीं सकता था! 
मेरे अंदर भी जाग चुकी, 
एक शक्तिशाली नारी थी!
कदम बढ़ाया, जब भी मैंने संघर्षो से नहीं हारी थी !
हां, मैं नारी जाती हूँ, 
अब मैं भी परिवार को प्यारी थी!
फड़फड़ाती रहती जिस पिंजरे में, 
अपनी पहचान छोड़ कर,
अब उड़ने लगी थी आसमान में, 
बंद पिंजरे को तोड़ कर!
हां, मुझे भी अब लड़को से कम नहीं 
बताया जाता है!
मुझे भी अब मेरे परिवार का गर्व बताया जाता है!
मैं भी अब अपनी एक अलग पहचान रखती हूँ !
औरत हूँ, पर अपने हक़ के लिए, 
अब लड़ सकती हूँ!
मैं भी अपने परिवार की रक्षा और भरण- पोषण कर सकती हूँ!
पर फिर भी एक सवाल ज़हन में बार- बार आता है!
औरत को आज़ादी कब मिलेगी, जिन्हे आज भी घर के अंदर सताया जाता है!
इसका अंत यही अब लगता है मुझको!
औरत को औरत का साथ देना चाहिए!
जहा समाज के नाम पर, 
उसकी ख्वाईशो को दबाया जाता है!
नारी सर्वगुण संपन्न है, फिर भी उसे वंश के लिए, अभिशाप बताया जाता है!

 - रेखा रुद्राक्षी।

गुम है !(कविता -संग्रह -"फड़फड़ाती उड़ान !"/कवियत्री -रेखा रुद्राक्षी !)

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गुम है !

अपनी यादों को, मेरे ज़हन में छोड़ गए तुम!
अच्छा होता, अगर साथ इन्हें तुम ले जाते!
तुम खुश रहो, दिल से दुआ करते है हम!
बस, चैन सुकून मेरा, तुम मुझे दे जाते!
रहती है शाम उदास और राते गुम- सी है!
काश, मुझे तुम उन लम्हो में, 
हंसने की वजह फिर दे जाते!
हो जाती मेरी रूह भी, तेरी वफ़ा की दीवानी!
वफ़ा के वजूद से तुम, वाकिफ अगर हो जाते!
करते न शिकायत, तुमसे यूँ रूठ कर जाने की!
वजह पता होती, तो बेशक मनाने आ जाते!
अकेले सफर में, 
अब चलना हमे अच्छा नहीं लगता!
संभल जाते भटकती राहों में, 
साथ अगर तुम दे जाते!
न जाते, यूँ रोज़ रब के दर, सज़दा करने,
मेरी मोहब्बत के खुदा,अगर तुम हो जाते!
नायाब तुम्हारा प्यार था, 
साथ अगर तुम्हारा हमे मिल जाता!
तो दुनिया के इस कारवां में, 
सबसे खुशनसीब हम बन जाते!
यूँ छोड़कर,मुँह मोड़कर, बिन कहे, 
तुम्हारा चल देना!
कुछ कहते, सुनते, शिकवे, शिकायतें, 
तो रिश्ते टूटते नहीं, संभल जाते!
तुम मेरी आँखों को पढ़ते, 
मैं तुम्हारी धड़कनों को सुनती!
सच कहुँ, तो ना फिर दूर तुम जाते, 
ना हम जाते!
यू ही सफर ज़िन्दगी का, 
ताउम्र कट जाता! तुम्हारे साथ,और गमों के दौर वही पर थम जाते!




- रेखा रुद्राक्षी।

हिज़ड़ा!(कविता -संग्रह -"फड़फड़ाती उड़ान !"/कवियत्री -रेखा रुद्राक्षी !),

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हिज़ड़ा!

ज़िन्दगी की एक अद्भुत उत्पति का परिणाम हूँ मैं!
कोख, एक मेरी माँ की, पर उसके जीवन में अभिशाप हूँ मैं!
न बेटी, न बेटा, 
किन्नरों की पहचान हूँ मैं!
ताली बजाता चौराहों पर, नव- जन्मतें बच्चों के घर, मेहमान हूँ मैं!
अपनी पैदाईश पर शर्मिंदा होते देख, सबकी नज़रो को, मैं अचंभित और कहीं न कहीं परेशान हूँ। 
एक ही डाली में खिलता फूल था, फिर भी उसके लिए बेकार हूँ मैं!
माँ की ममता भी जैसे खो जाती है!
जब किन्नरों की टोली, मुझे अपने संग ले जाती है!
छोटा- सा बचपन गालियों 
और तालियों के बीच बढ़ जाता है!
मेरा नन्हा- सा बचपन, 
न जाने कितनी देहलीजें चढ़ जाता है!
वो दहलीजें, जहाँ हम तमाशाई बनकर,सबका मन बहलाते है!
चंद पैसो के लिए, अपना हर अंग, खुले बाजार के तरह दिखलाते है!
किसी के घर नव- जीवन पैदा हो, 
तो हम झूम- झूम कर गाते है!
पर सच कहे, तो उन लोगो को हम बिलकुल नहीं भाते है!
दर्द हमे भी होता है, जब कोई हमारे वजूद पर उंगली उठाता है!
हमारा भी अस्तित्व है अपना, ये क्यों कोई समझ नहीं पाता है!
न हम बेटी, न हम बेटा, फिर भी 
हमारी इज़्ज़त को उतारा जाता है!
इस गन्दी नासमझ लोगों की 
बस्ती में, हमे भी चरित्रहीन बताया जाता है!
लोग क्यों कतरा कर, हमारे चारो तरफ से निकलते है!
जैसे हम हर इंसान को, अपवित्र 
करने का सामान रखते है!
हमे मंदिर जाने का अधिकार नहीं, हमे जीवन-साथी की आस नहीं!
एक झुंड बनाकर के हमारा,हमारे आशियाने को, बाजार बताया जाता है!
जब मौत हमारी होती है, सब हसते है, सब गाते है!
ताली बजा- बजा के, 
हमारे मरने का जश्न मनाते है!
अलग जन्म हमारा भी इंसान का हो, रब से गुहार लगायी जाती है!
किनरों की बस्ती से, जब लाश 
 हमारी उठायी जाती है!
भेडियों से  भरा है जंगल, 
इस दुनिया की भीड़ में!
नोच- नोच कर ये हर मज़बूर की, 
मांस क्या, चमड़ी तक खा जाते है!
सोचते है, 
तो कितना घिनौना ये संसार है!
दुआ करते है, हर घर बेटी या बेटा ही पैदा हो!
क्युँकि किन्नर होना, 
एक बहुत बड़ा अभिशाप है!
बेशक अब नए युग में, 
हमे सम्मान से देखा जाता है!
पर एक परिवार की चाह में, 
जीवन अधूरा ही रह जाता है!  

- रेखा रुद्राक्षी







फासला!(कविता -संग्रह -"फड़फड़ाती उड़ान !"/कवियत्री -रेखा रुद्राक्षी !),

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फासला!

ज़िन्दगी में दुखों का सिलसिला, कुछ इस कदर बढ़ गया है,
जो हमारे थे, 
उनसे भी ताउम्र का फासला कर गया है!
किया करते थे, 
उनसे रोज़ अपने दर्दो- रंज की बाते!
दर्द दिल का, हद से ज्यादा कुछ बढ़ गया है!
वो मासूम था, उसे शायद हम समझ न पाए!
कि तेरा प्यार, मेरे दिलो- दिमाग में, किस तरह चढ़ गया है!
मजबूरियां, तेरी मुझे मालूम थी, 
ए मेरे हमसफ़र!
इसलिए, तेरा साथ हर कदम पर देने से, 
मेरा दिल भी डर गया है!
मुझे गम नहीं, की तू मुझे सरे आम बेवफा कहे!
तुझसे वफ़ा करके, 
मेरा दिल मुझसे वफ़ा कर गया है!
आज अफसोस, सिर्फ इस बात का है!
दिन तेरी यादो में बीता और शामें आंसुओ से, 
मेरा दामन भर गया है!
अब कभी, जब भी मैं, 
अपनी रूह से रूबरू होती हुँ!
देखती हूँ तेरा प्यार, मेरी धड़कन, मेरी साँसों, 
मेरे रूह में भी, अपना घर कर गया है!
अकेलेपन का एहसास तो है, 
दिल तेरे बिन उदास तो है!
पर मुस्कुराती हूँ, ये सोचकर, 
रब से किया था तेरी खुशियों का वादा!
आज इसलिए उसके दर पर, मेरा आना- जाना पहले से ज्यादा कुछ बढ़ गया है!

- रेखा रुद्राक्षी।






तेरा दीदार!(कविता -संग्रह -"फड़फड़ाती उड़ान !"/कवियत्री -रेखा रुद्राक्षी !),

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तेरा दीदार!

कर दें, हर रास्ता बंद! तुझ तक पहुंच ना पाऊं मैं!
तेरा दीदार पाना है, 
कहीं हद से ना गुजर जाऊं मैं!
पर बेखौफ है तू, क्यूंकी तेरा दिल जानता है,
तेरा घर जल जाएं, 
ऐसी कभी कोई शमां ना जलाऊं मैं!
मर जाऊंगी, ये वादा है मेरा !
पर मेरी वजह से तुझे तकलीफ़ हो,
ऐसी वजह को ही फना कर जाऊंगी मैं!
जब होगा तब होगा,
वक्त तेरे पास मुझसे मिलने का!
पर एक बार, 
इस बेरहम किस्मत को बनाने वाले,
उस खुदा से, तो एक बार मिल आऊं मैं!

- रेखा रुद्राक्षी।




ये ज़रूरी तो नहीं!(कविता -संग्रह -"फड़फड़ाती उड़ान !"/कवियत्री -रेखा रुद्राक्षी !),

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ये ज़रूरी तो नहीं!

हर इंसान पत्थर दिल हो, ये ज़रूरी तो नहीं!
पर हर इंसान नरम दिल हो, 
ये भी ज़रूरी तो  नहीं!
समझ जाये जो, आपकी आँखों से, 
आपकी ख्वाइशें,
हर शख्स ऐसा मिल जाये, ये भी ज़रूरी तो नहीं!
लाख मुसीबतें हो, बंदिशे हो, मज़बूरियाँ हो,
पर आपके लिए दुनिया से लड़ जाये कोई, ये भी ज़रूरी तो नहीं!
वफ़ा करे, प्यार जताये, आपको बेपनाह चाहे,
पर आपको अपना हमसफ़र बना ले, 
ये भी ज़रूरी तो नहीं!
कसमें खाये, वादे निभाए, 
एक आवाज़ पर मिलने चला आये,
पर आपके हर दर्द को समझे, 
ये भी ज़रूरी तो नहीं!
छोटी-छोटी बातें याद रखे,
आपकी ख़ुशी के लिए कुछ भी कर जाये,
पर आपके लिए अपने परिवार के खिलाफ जाए, ये भी ज़रूरी तो नहीं!
मोहब्बत जताये, आपके लिए, आंसू बहाये, 
बेचैन हो जाये,
पर आपकी हर तकलीफ में साथ खड़ा हो, 
ये भी ज़रूरी तो नहीं!
सच कहुँ, दुनिया से लड़ जाये, प्यार निभाए, 
मेरे दर्द को समझ जाये,
काश, ऐसा कोई मिल जाये, फिर ज़िन्दगी मे 
कुछ भी ज़रूरी तो नहीं!
तू मिल जाये, बस तू मिल जाये, तेरा साथ मिल जाये,
तो सच में कुछ भी ज़रूरी तो नहीं!
तेरे सिवा कुछ भी ज़रूरी तो नहीं!!

- रेखा रुद्राक्षी!










लकड़ी!(कविता -संग्रह -"फड़फड़ाती उड़ान !"/कवियत्री -रेखा रुद्राक्षी !),

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लकड़ी!

कितनी ईमानदार है लकड़ी!
हमेशा साथ है लकड़ी,
बड़ी कमाल है लकड़ी!
बेशक हम अपनी बातों में, 
नहीं करते ज़िक्र लकड़ी का!
पर ताउम्र साथ-साथ है लकड़ी!
जो रिश्तों की अहमियत नहीं समझे,
उनके लिए तो, बस, बेकार है लकड़ी!
पर सच कहें, 
तो बड़ी ईमानदार है लकड़ी!
पेड़ों की छाँव से लेकर,घर का शृंगार है लकड़ी!
हमेशा साथ है लकड़ी,
बड़ी कमाल है लकड़ी!
पुरानी यादों से जुड़ा संसार है लकड़ी!
स्कूल जाते थे, लिखते-पढ़ते थे जिस तखती पर!
वो किताब है लकड़ी!
बचपन मे चलना सीखते थे, जिस उड़न- खटोलें पर!
वो तीन पहियों की कार है 
लकड़ी!
हमेशा साथ है लकड़ी,
बड़ी कमाल है लकड़ी!
वो चार पहियों की खाट का 
बिछौना था!
पूरे परिवार की शाम गुज़रती थी, जिस पर बैठकर!
उस सोफे और बिस्तर का, 
अविष्कार है लकड़ी!
हमेशा साथ है लकड़ी,
बड़ी कमाल है लकड़ी!
कोई गलती हो, तो पापा मार- मार के तोड़ देते थे!
वो पुराना हथियार है लकड़ी!
सावन की घटा छाती थी, तो झूला झूलते थे!
हमारे आँगन में वो पेड़ की 
डाली, बड़ी मज़बूत थी लकड़ी!ढलती उम्र के साथ, झुकती 
कमर के दर्द को, जो आराम 
देती थी!
जिस कुर्सी में बैठकर आराम करते थे ,वही हमेशा साथ थी लकड़ी!
हमेशा साथ है लकड़ी,
बड़ी कमाल है लकड़ी!
ना कोई संगी, ना कोई साथी था, अकेला सफर बाकी था!
उसी सफर में जो दूर तक, 
साथ चली, वही हमसफ़र है 
लकड़ी!
बड़ी गहरी नींद में, जब हम सोये और हुए रुखसत, दुनियासे!
उस वक़्त बांस की वो शैया 
बनी, मेरा वो घर बार थी 
लकड़ी!
हमेशा साथ है लकड़ी,
बड़ी कमाल है लकड़ी!
अंतिम समय तक जिसने 
वफ़ा निभाई,
सच मानिये, सबसे ईमानदार है लकड़ी!        

- रेखा रुद्राक्षी।







अल्फाजों के मोती!(कविता -संग्रह -"फड़फड़ाती उड़ान !"/कवियत्री -रेखा रुद्राक्षी !),

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अल्फाजों के मोती!

गमों को चलो कुछ तो, इस तरह फिर सताया 
जाए!
क्यूं ना खुलकर, अब हर रोज मुस्कुराया जाए!
लोगों की नजरों में बन जाए, पहचान हमारी 
अपनी!
ऐसा कोई हुनर खुद में जगाया जाए!
गमों को चलो कुछ तो, इस तरह फिर सताया 
जाए!
क्यूं ना खुल कर, अब हर रोज मुस्कुराया जाए!
फरेब के दल-दल में, जो डूब चुकी है दुनिया!
हौंसला करके क्यूं ना,उस दल-दल को फिर से, जमीं बनाया जाए?
गमों को चलो कुछ तो, इस तरह फिर सताया 
जाए!
क्यूं ना खुलकर, अब हर रोज मुस्कुराया जाए!
गुजर जाएगी, दुखों की हर एक घड़ी!
क्यूं ना दुखों को,मदारी का इशारा समझ नचाया जाए?
गमों को चलो कुछ तो, इस तरह फिर सताया 
जाए!
क्यूं ना खुलकर, अब हर रोज मुस्कुराया जाए!
रो कर हमेशा, आंखों को दर्द देने से अच्छा है,
आंखों को बंद कर, नया सपना कोई बेहतरीन 
सजाया जाए!
गमों को चलो कुछ तो, इस तरह फिर सताया 
जाए!
क्यूं ना खुलकर, अब हर रोज मुस्कुराया जाए!
आती ना हो, जहां बीती यादें लौट कर,
क्यूं ना उस जगह पर, एक आशियाना बनाया जाए!
गमों को चलो कुछ तो, इस तरह फिर सताया 
जाए!
क्यूं ना खुल कर, अब हर रोज मुस्कुराया जाए!

- रेखा रुद्राक्षी।











दरख़्त!(कविता -संग्रह -"फड़फड़ाती उड़ान !"/कवियत्री -रेखा रुद्राक्षी !),

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दरख़्त!  (2nd style/type) 
                  
रहनें दो कटे हुए दरख़्तौं को, सूखा हुआ,
वो अब निष्प्राण है!
वो अपने लिए अब भी लड़ नहीं सकतें,
उनमें नहीं अब जान है!
हरे- भरे होकर भी, 
कौन- सा वो लड़ पायें थे !
कभी तुफां से टकराकर गिरें, 
तो कभी आंधी आनेपर थर्राए थे !
ये जिंदगी भी इन दरख़्तौं की तरह है!
हरी- भरी, पर थर्राई-सी, 
गमों की आंधी से कंप- कंपाई- सी!
कब कौन जिंदगी में तुफां ला दें, 
इस बात से घबराई- सी!

एक पौधा बचपन से सींचा जाता है,
एक उम्मीद की चाहत में! 
फुल हुए तो खुशबु देंगे, 
फल हुए तो खाएंगे!
मतलब परस्त है दुनिया!
किससे कितना फायदा होगा, 
रिश्ता उसी से बनता कमाल है!
बिन काम के अब,
रिश्तें कौन निभाता है?
सुखे दरख़्तौं की तरह अब, 
रिश्तों को भी जड़ से उखाड़ 
दिया जाता है!
रहनें दो कटे हुए दरख़्तौं को, सूखा हुआ,
वो अब निष्प्राण है!
वो अपने लिए अब भी लड़ नहीं सकतें,
उनमें नहीं अब जान है!

-रेखा रुद्राक्षी।






दरख़्त!(कविता -संग्रह -"फड़फड़ाती उड़ान !"/कवियत्री -रेखा रुद्राक्षी !),

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दरख़्त!
             
रहनें दो कटे हुए दरख़्तौं को, सूखा हुआ,वो अब बेजुबान है!
वो अपने लिए लड़ नहीं सकतें,उनमें नहीं अब जान है!
रहने दो कटे हुए दरख़्तौं को, सूखा हुआ,वो अब बेजुबान है!
हरे- भरे होकर भी 
कौन- सा वो मुस्कुराए है!
कभी तुफां से टकराकर गिरें, तो कभी आंधी आने पर थर्राए है!
रहने दो कटे हुए दरख़्तौं को, सूखा हुआ,वो अब बेजुबान है!
वो अपने लिए लड़ नहीं सकते,उनमें नहीं अब जान है!
ये जिंदगी भी इन दरख़्तौं की तरह है!
हरी- भरी, पर थर्राई
-सी, गमों की आंधी से कंप- कंपाई- सी!
कब कौन जिंदगी में तुफां ला दें, इस बात से घबराई- सी!
रहने दो कटे हुए दरख़्तौं को, सूखा हुआ,वो अब बेजुबान है!
वो अपने लिए लड़ नहीं सकते,उनमें नहीं अब जान है!
एक पौधा बचपन से सींचा 
जाता है!
एक उम्मीद की लौ की चाहत में, उसे लम्बी उम्र तक खींचा जाता है!
फुल हुए तो खुशबु देंगे, फल 
हुए तो खाएंगे!
मतलब परस्त है दुनिया, इन दरख़्तौं से सीखा जाता है!
रहने दो कटे हुए दरख़्तौं को, सूखा हुआ,वो अब बेजुबान है!
वो अपने लिए लड़ नहीं सकते,उनमें नहीं अब जान है।
जीवन-चक्र का भी यही हाल है!
किससे कितना फायदा होगा, रिश्ता उसी से बनता कमाल है!
बिन काम के अब रिश्तें कौन निभाता है?
सुखे दरख़्तौं की तरह अब,  रिश्तों को भी जड़ से उखाड़ 
दिया जाता है!
रहने दो कटे हुए दरख़्तौं को, सूखा हुआ,वो अब बेजुबान है!
वो अपने लिए लड़ नहीं सकते, उनमें नहीं अब जान है!

-रेखा रुद्राक्षी।




दोस्ती का सिलसिला!(कविता -संग्रह -"फड़फड़ाती उड़ान !"/कवियत्री -रेखा रुद्राक्षी !),

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दोस्ती का सिलसिला!

हो जाये हैरान भी, ये ज़िन्दगी हमें देखकर!
हर दर्द का कुछ इस तरह मजा लिया जायें!
बेशक आ जाये, तूफ़ान उजाड़नें घर मेरा!
पर वही रहकर, 
क्यों न अपने आशियाने को बचालिया जाए!
बेशक तेज़ आंधियाँ, लड़खड़ा दें हमारे कदम!
फिर भी क्यों न,उन आंधियों की थपेड़ों को,
एक बार तो झेला जाये?
एहसास तब ही जीवन- संघर्ष का होगा!
जब हौसला हर तूफ़ान से, लड़ने का किया जाए!
तो चलो, चले समंदर की तेज़ लहरों से टकराने!
ज़िन्दगी को पत्थर बना कर,
हर मुश्किल का सामना ,
कुछ इस तरह किया जाए!

- रेखा रुद्राक्षी।




बेवफा!(कविता -संग्रह -"फड़फड़ाती उड़ान !"/कवियत्री -रेखा रुद्राक्षी !),

C:\Users\User.pc\Downloads\photos (1)\bewaffa.jpg

बेवफा!

होती थी तकलीफ, इस दिल को!
धीरे- धीरे तेरा दिया ज़ख़्म भी नासूर हो गया था!
मालूम था, अब तन्हाइयों का सफर है आगे!
आंसुओं का दरिया, इसलिए ठहर कर थमने को मजबूर हो गया था!
क्या होता दिन-रात,
आंसुओ से दामन अपना भीगाकर?
जब मेरे आंसुओं को पोंछने वाला ही, 
मुझसे दूर हो गया था!
समझ चुके थे, अकेला सफर नहीं कटने वाला!
दिल बोझिल- सा, नए हमसफ़र की तलाश में, 
फिर हो गया था!
डर तो था, कि फिर नया ज़ख़्म, नहीं मिल जाये कोई!
पर हम भी बेवफा बनना चाहते थे अब!
क्योंकि तन्हाइयो को भी, 
हमसे बेइन्तहा प्यार हो गया था!

- रेखा रुद्राक्षी।


मेरा दर्द! (कविता -संग्रह -"फड़फड़ाती उड़ान !"/कवियत्री -रेखा रुद्राक्षी !),

C:\Users\User.pc\Downloads\photos (1)\mera dard.jpg

मेरा दर्द!

अपना हर दर्द, अब खुद से बांटती हूँ!
शिकवा-शिकायत, अब किसी से नहीं करती हूँ!
हर शख्स आजकल झूठ का दरिया है,
ये जानती हूँ!
क्या फायदा पत्थर से टकराकर, उसे कोसने से!
पत्थर ने ही संभल कर चलना सिखाया,
ये बात मानती हूँ!
नहीं मजबूर कर सकतें हालात,
कि कोई किसी का दिल तोड़ें!
धोखेबाज़ों की है ये निशानी, मैं बस ये जानती हूँ!
कोई मानें न मानें, अब मुझे फर्क नहीं पड़ता!
मैं खुद ही खुद का हौंसला हूँ, बस ये मानती हूँ!
हर शख्स से रूबरू होकर भी,
उन पर विश्वास नहीं करती!
क्योंकि ये कलयुग है,
बदलते चेहरे पहचानती हूँ!

- रेखा रुद्राक्षी।

बुधवार, 13 मई 2020

अहमियत पानी की!(कविता -संग्रह -"फड़फड़ाती उड़ान !"/कवियत्री -रेखा रुद्राक्षी !),


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अहमियत पानी की!

बहती आँखों से गिरता, थम गया पानी!
मेरे हर गम-ए-दर्द से, इतना डर गया पानी!
जिससे थी उम्मीद,
कि वो, 
आँखों को नम न करेगा!
वही अपनी यादों से, 
आँखों में मेरी, 
भर गया पानी!
उसकी आँखें, 
कभी किसी दर्द से भर जाती जब,
कर जाती दिल पे असर, 
बे-दर्द वोपानी!
बर्बाद हो गया, 
हर वो बसा शहरों-जहाँ !
जब तेज तूफान में, 
हद से ज्यादा बढ़ गया पानी!
प्यासी जमीं भी झूम कर, 
खिलखिलाने लगी!
आसमां से जब, 
सूखी जमीं पर उतर गया पानी!
शर्म आती नहीं, 
अब उन गुनाहगारों को!
जिनकी आँखों में, 
हैवानियत का,
घर कर गया पानी!

- रेखा रुद्राक्षी।




आग धर्म की!(कविता -संग्रह -"फड़फड़ाती उड़ान !"/कवियत्री -रेखा रुद्राक्षी !),


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आग धर्म की!

धर्म की आग लगानें वालों! मत बांटो भगवान को!
राम -रहीम को मत ललकारों! पहचानो इंसान को!
खून -खराबा बहुत कर चुके,
क्या बांटोगें अब संसार को!
चलों चांद बांट लो! सूरज भी बांट लो!
और बांट के दिखाओं ,सुबह और शाम को!
मुस्लिम के लिए, तुम चांद छोड़ दो!
और सूरज दे दो ,हिन्दू धर्म-समाज को!
कर सकता हों, जो इनके टुकड़ें!
वो कहीं तो, एक इन्सान हो!
क्या पागलपन ,क्या बहरापन?
जो सून ना सकों, दर्द भरी आवाज तुम!
ख़ुदा वहीं ,भगवान वहीं!
रहम वहीं, इन्सान वहीं!
बस, धर्म के दंगों में जिन्हें जला दिया!
ढूंढो, खोजों , बस खोया है इन्साफ कहीं!
बस ,खोया है ईमान कहीं!

- रेखा रुद्राक्षी।



प्रेम और रुसवाई!(कविता -संग्रह -"फड़फड़ाती उड़ान !"/कवियत्री -रेखा रुद्राक्षी !),


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प्रेम और रुसवाई!

 लोग कहते हैं ,प्यार अधूरा होता हैं!
हर सपना नहीं पूरा होता है!
ये कृष्णा ने बताया, राधा से प्रेम कर!
उम्र से प्यार का नहीं रिश्ता होता है!
दिल अगर समझ जाता, दुनिया की रस्में!
तो खाता न कोई, प्यार की कसमें!
प्रेम की परिभाषा, राधे-कृष्ण ने सिखाई है!
फिर हमारे प्रेम में ,क्यूँ जग की रुसवाई है?
मेरा भी प्रेम सच्चा ,तेरा भी प्रेम सच्चा!
मैंने प्रीत तुझसे सच्ची निभाई हैं!
जाना है तुमको ,तो चले जाओ दूर!
न कहना कि अब ,
खत्म हमारी कहानी हुई है!
मैंने तुझसे सच्चा प्रेम किया है!
ये राधा तो तेरी दिवानी हुई है!
दुनिया की बातें, न कर मेरे आगे!
रुह कृष्णा की भी, राधा में समाई हुई है!

- रेखा रुद्राक्षी।






जिंदगी जंग ही तो हैं!(कविता -संग्रह -"फड़फड़ाती उड़ान !"/कवियत्री -रेखा रुद्राक्षी !),


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जिंदगी जंग ही तो हैं!

जिंदगी अजब तमाशा लगती है!
मुस्कुराते हुए लब है लेकिन,
आंखों में दर्द की चमक, गहरी लगती है!

क्या करें, दिल को समझाने के सिवाय,
यहां हर खुशी ,कहीं ठहरी लगती है!

शांत रखें दिल में ,उमड़ते सवालों का ज़ल-ज़ला,
यहां दुनिया कत्ल करने की तैयारी रखती है!

हर हाल में जीना है, अगर इस दुनिया में,
तो मुस्कुराते रहों, हर ग़म में भी!
यहां किसी को किसी की,
खुशी नहीं प्यारी लगती है!

हर किसी की हैं, कोई न कोई गम-ऐ –दास्तां!
सबकी जिंदगी में किस्मत ,
एक न एक जंग जारी रखती है!

- रेखा रुद्राक्षी।


बही-खाता!(कविता -संग्रह -"फड़फड़ाती उड़ान !"/कवियत्री -रेखा रुद्राक्षी !),


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बही-खाता!

मैं खुद अपनी ज़िन्दगी की, किताब लिख रही हूँ!
हर बात, हर दर्द, हर गुनाह का ,हिसाब लिख रही हूँ!
कुछ छूट न जायें मुझसे ,इसलिए पन्नें बेहिसाब लिख रही हूँ!
मैं खुद अपनी ज़िन्दगी की, किताब लिख रही हूँ!
गुम हुई ख़ुशी कब, खाली हुआ दामन कब?
उस पल, उस लम्हें का, हिसाब लिख रही हूँ!
मैं खुद अपनी ज़िन्दगी की, किताब लिख रही हूँ!
कल मिला क्या था, आज छूटा क्या है?
मेरी उदासी की ये वजह क्या है?
पुरानी ज़िन्दगी के बही -खातें का, नया हिसाब लिख रही हूँ!
मैं खुद अपनी ज़िन्दगी की, किताब लिख रही हूँ!
किसका दिल दुखाया, किसकों कब गले लगाया!
किसकी मजबूरियों को समझा,
किसका साथ निभाया!
ऐसे लम्हातों का बही-खाता,
लाजवाब लिख रही हूँ!
मैं खुद अपनी ज़िन्दगी की, किताब लिख रही हूँ!
सोचती हूँ शायद, कुछ तो मुझमें बदलाव आएगा!
जो ज़िन्दगी को संवार दें, वो पन्ना खोया हुआ
मिल जायेगा!
इसलिए सोच -समझकर,
 हर बीती बात को लिख रही हूँ!
मैं खुद अपनी ज़िन्दगी की, किताब लिख रही हूँ!
कुछ मिलें, न मिले, पर क्यों अधूरा मेरा ख्वाब?
इसकी वजह क्या थी, ये राज़ खुल जायेगा!
बीती बातों के राज़ खुल जाने से,
शायद मेरा आज संवर जायेगा!
इसलिए, मैं खुद अपनी ज़िन्दगी की, किताब
लिख रही हूँ!
हर बात, हर दर्द, हर गुनाह का, हिसाब लिख रही हूँ!                                               

- रेखा रुद्राक्षी।






प्यार न त्याग हैं, न समझौता!(कविता -संग्रह -"फड़फड़ाती उड़ान !"/कवियत्री -रेखा रुद्राक्षी !),


C:\Users\User.pc\Downloads\poetrypart2\5. pyar na tyag.jpeg

प्यार न त्याग हैं, न समझौता!

 प्यार वफा मांगता है!
पर हर कोई  जफा कर रहा है!
बेवफ़ाई,दगा,धोखा हर रिश्ते में हो रहा है!
यहां कौन किससे वफा कर रहा है?
आंखों में अधूरी ख्वाहिशें,
और सपने पूरे होने की इल्तज़ा कर रहा है!
हर कोई पाना चाहता है ,सच्ची मोहब्बत!
पर, कौन सच्ची मोहब्बत कर रहा है!
जिसे तुमने मजबूर हालातों में 
छोड़ दिया था,कुछ रिश्तों के लिए!
उसे पाने के लिए अब क्यूं तू,
हर दर पर दुआ कर रहा है?
ये किस्मत तो ताश की गड्डी हैं साहेब!
कभी हार ,तो कभी जीत का
 मंजर दिखाती है!
जो वक्त पर जीत गया, उसका मुक्कदर!
वरना ये हर मोड़ पर, सब छीनती जाती है!
इसलिए जो हर हाल में, जियें आपके लिए,
उसे जाने न दो!
लाख मजबूरियां हो जिन्दगी में,
दूरियां दरमियान एक-दूजे 
के कभी आने न दो!

- रेखा रुद्राक्षी।

तेरी नज़रें!(कविता -संग्रह -"फड़फड़ाती उड़ान !"/कवियत्री -रेखा रुद्राक्षी !),


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तेरी नज़रें!

तेरी नज़रों में,
बड़ी अहमियत पाई है हमने!
यहीं तो ,दिल की दुनिया बसाई है हमने! 
बहुत खूबसूरत हैं आंखे तेरी,
इनमें ही तो वफा की झलक पाई है हमने!
माना कि हमारा साथ नहीं मंजूर किस्मत को!
पर तेरे साथ जो लम्हे जिये थे,
उन लम्हों में सुकून की घड़ियां बिताई है
 हमने!
बेशक नहीं अब हमकदम ,
हम साथ, हमसफ़र,
पर तेरे ही साथ, दिल से वफा निभाई है 
हमने! तेरी नज़रों में,
बड़ी अहमियत पाई है हमने!
 यहीं तो, 
दिल की दुनिया बसाई है हमने!

-रेखा रुद्राक्षी।   






तेरी खुशी के लिए!(कविता -संग्रह -"फड़फड़ाती उड़ान !"/कवियत्री -रेखा रुद्राक्षी !),


C:\Users\Bajaj.com\Desktop\Poetry Rekha Sharma\11. teri khushi.jpeg

तेरी खुशी के लिए!

 जानते है, कशमकश हैं, दोनों तरफ!
मोहब्बत के वादे है, दोनों तरफ!
न हमको मिलायेगी,किस्मत कभी!
न साथ चलेंगें हम, उम्र-भर!
फिर भी दिल धड़कता, तेरे लिए है!
तेरी कमी है,तेरी जुस्तजू हैं!
अगर ये जुदाई,ये तड़प ही न होती,
मोहब्बत की कीमत, फिर पता कैसे होती!
ये दर्दों-रंज की आंखों से,बारिश न होती!!
तो यादों में, यूँ बेकरारी न होती!!!
गर, समझ जाता, 
हर कोई वफा का सलीका,
तो जफां करने वालों से, 
जंग जारी न होती!
मिल जाती मोहब्बत, 
सिर्फ चाहने से,
तो दुआओं में,उसे मांगने की खुमारी न होती!
न दिल टूटता, न मौत को गले लगातें,
गर तुझसे बिछड़ने की चोट,
दिल ने खाई न होती!
कहना आसान हैं, 
के नया आशियाना बना लो!
बनाते तो, तब जब एक पल भी,
तेरी याद, इस दिल को 
आई न होती!
काश ,काश के तू ही, 
मेरा हमसफ़र होता!
जिंदगी का हर लम्हा, तेरे संग होता!
पर, काश किस्मत में जुदाई न होती!
न होती परवाह जमाने की तुझको!!
तो आज तेरी पनाहों से,
हमने यूँ दूरीयां बढ़ाई न होती!
तेरी खुशी,बस तेरी खुशी के लिए,
हमने मोहब्बत की दुनिया अपनी जलाई न होती!

- रेखा रुद्राक्षी।






मैं तन्हा क्यूं हूं?(कविता -संग्रह -"फड़फड़ाती उड़ान !"/कवियत्री -रेखा रुद्राक्षी !),


C:\Users\Bajaj.com\Desktop\Poetry Rekha Sharma\12. tanha.jpeg

मैं तन्हा क्यूं हूं?

साथ सच्चा न मिलें, 
तो क्या कीजिएगा?
बार-बार, क्या रब से दुआं कीजिएगा?
मैं तन्हा हूं, दुनिया से भरी भीड़ में भी,
ये शिकवा,शिकायत किससे कीजिएगा?
अपना ही साथ खुद से, 
हम निभा न पाए!
किसी और से हमदर्द बनने कि,
न कभी इल्तज़ा कीजिएगा!
ये दुनिया, 
नहीं मरहम लगाने के काबिल!
अपने दर्द, जरा सोचकर बयां कीजिएगा!
जब अपने ही बन जाएं, 
कातिल शहर में!
तो बचाने की, किससे दुआं कीजिएगा?
नहीं हर कोई हमनवां- हमसफ़र!
दिल लगाने की,न कोशिशें कीजिएगा!
यहां हर कोई जला रहा है, 
खुशी के आशियाने!
बस, अपने मकां की हिफाजत कीजिएगा!
मैं तन्हा हूं,मुझे नहीं अफसोस कोई!
जब अपने ही देने लगें, हर बार धोखा,
तो किससे वफा-ए- मोहब्ब्त का,
शुरु सिलसिला कीजिएगा!
तन्हाई हमको सिखाती है हरदम!
के हमसे ही, अपने गमों का सौदा कीजिएगा!
किसी और से, 
कह गए जो राज-ए - दिल,
तो चुप रहने की, 
न उससे फिर इल्तज़ा कीजिएगा!
इसलिए, तन्हाइयों का सफर ही अच्छा,
अपने जख्मों पर, खुद ही, हँसकर मज़ा लिजियेगा!

- रेखा रुद्राक्षी।



हाँ ,मैं औरत हूँ!(कविता -संग्रह -"फड़फड़ाती उड़ान !"/कवियत्री -रेखा रुद्राक्षी !),


C:\Users\User.pc\Downloads\poetrypart2\21. aurat hu.jpeg

हाँ ,मैं औरत हूँ!

हाँ ,मैं औरत हूँ, और परेशां हूँ!
ये घूरती आंखें,ये जिस्मों के किस्से!
दुनिया के रिवाजों से हैरां हूं!
 एक औरत ,बेटी, मां के कर देते हैं हिस्से!
वो इठला के आई थी,वो मुस्कुराई थी,
लोगों के ताने सुन ,वो घबराई थी!
देखा ,जो चादर को खोल के!
छोटी -सी कली, खून से लथपथ,
मां -मां चिल्लाई थी!
हाँ, मैं औरत हूँ,और परेशां हूँ!
कानून की दहलीज पर सबने
रगड़ डाली चप्पलें!
पर रिहा ,उनको कर दिया,
जिनकी जेबों में नोटों की गरमाई थी!
वाह, कानून तुझे सब पता था!
तभी तो इन्साफ की देवी को,
काली पट्टी पहनाई थी!
इन्साफ मांगे कहां, किससे?
कई बार अपनों के हाथों,
इज्ज़त की हुई रुसवाई थी!
हाँ, मैं औरत हूँ,और परेशां हूँ!

- रेखा रुद्राक्षी।


रंज तो हैं!(कविता -संग्रह -"फड़फड़ाती उड़ान !"/कवियत्री -रेखा रुद्राक्षी !),


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रंज तो हैं!

न उलझनें रही, न परेशानियां रही!
न शिकायतें रही ,न रंजिशे रही!
तू कल भी था और आज भी है!
तेरे सिवा जिन्दगी में,
न किसी की निशानियां रहीं!
उम्मीद की लौ, आज भी जल रही है!
तेरे आने की आस मेरे घर के,
चिरागों को हर बार ही रहीं!
मालूम था ,के ये इन्तज़ार फिजूल है!
फिर भी तेरी आहट सुनने को,
दिल में बेकरारियां रहीं!
था तेरे साथ,चन्द मुलाकातों का सिलसिला !
पर उन पलों में भी,
तेरे प्यार की, बस खुमारियां रही!
बेशक न होंगी,अब फिर से मुलाकातें अपनी!
पर सुकुन इस बात का है,
कि तेरी वफ़ा और मोहब्बत में ,
 कभी न खामियां रही!
मिला न तेरा साथ,  
इस जन्म मुझको!
इस बात का रंज तो है!
पर तेरी खुशी के लिए,
मेरी नम आंखें भी मुस्कुराई!
मेरे दिल में तेरे लिए, 
प्यार कम तो नहीं!
मेरे दिल में ,तेरे लिए ,
प्यार कम तो नहीं!

- रेखा रुद्राक्षी।





दुआ में असर रखना!(कविता -संग्रह -"फड़फड़ाती उड़ान !"/कवियत्री -रेखा रुद्राक्षी !),


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दुआ में असर रखना!

लिख रहा हूँ, एक दास्तां नसीब की!
फिर रहा हूँ, हर जगह, मैं हर घड़ी!
थका हारा फिर भी,मैं बिल्कुल नहीं!
राह ऐसी कौन- सी,जिसकी मंजिल नहीं?
बस खुद पे भरोसा और विश्वास है मुझे!
यहां बिना संघर्ष के होता,
कुछ भी हासिल नहीं!
बस या रब !मेरी इल्तज़ा सुन लेना!
मेरा रूतबा,जब भी ऊँचा हों,
मेरे कदमों को,ज़मी से जुड़ा रखना!
न दुखाऊं ,दिल किसी का,
किसी वक्त में!
मेरे दिल में, सबके लिए,
ऐसी मोहब्बत रखना!
जब भी बैठूं मैं ज़मीं पर,
लोग उसे मेरा बड़प्पन समझें!
ऐसी शख्सियत और इन्सां हमेशा,
 मेरे संग रखना!
लिखूँ जब भी मैं, कोई नज़्में, 
गीत या ग़ज़ल!
उस पन्ने पर,
बस अपनी नज़र रखना!
कर रहा हूँ जिंदगी से, 
जंग जीतने की तैयारी!
बस, मेरे बढ़ते कदमों के नीचे,
कामयाबी का एक छोटा-सा, शिखर रखना!
जीत जाऊँगा एक दिन,
इसका यकीं है मुझे!
पर फिर भी, 
अपनी रहमत का असर रखना!

- रेखा रुद्राक्षी।





तू मेरा, हमसफ़र बन जा!(कविता -संग्रह -"फड़फड़ाती उड़ान !"/कवियत्री -रेखा रुद्राक्षी !),


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तू मेरा, हमसफ़र बन जा!

चुप नहीं रहता ये दिल ,अक्सर तेरा नाम 
लेता है!
तन्हा सफर हैं पर, फिर भी सब्र से काम 
लेता है!
हक  हुआ,  जिसका  मेरे  ज़िस्म के  हर 
टुकड़े पर!
वो तेरा प्यार है, जो हर पल मेरे पास होता है!
कितना समझाया कि तन्हा सफर है
 जिंदगी का!
पर तू बनेगा मेरा हमसफ़र, 
ये एतबार होता है!
कितना चाहा कि मैं ग़म ,रो के सभी कर लूँ 
कम!
पर तेरी बाहों में ही, सुकून हर बार होता है!
इश्क  में  टूट  गया  है , हर शख्स कुछ इस
 तरह,
कि वफा के नाम पर भी नहीं एतबार होता है!
मेरी तन्हाईयां, अक्सर तुझे महसूस करती है!
तेरे एहसास से ही, हर ग़म मेरा दूर होता है!
मेरी आखिरी ख्वाहिश ,तू मेरा हमसफ़र 
बन जा!
मेरी हर दुआं में, 
तू मेरे साथ हर रोज़ होता है!

- रेखा रुद्राक्षी। 



प्यार, एक व्यापार ! (कविता -संग्रह -"फड़फड़ाती उड़ान !"/कवियत्री -रेखा रुद्राक्षी !),


C:\Users\User.pc\Downloads\poetry4\21. pyar ya vyapar.jpeg

प्यार, एक व्यापार !

प्यार, जिसका पहला शब्द अधूरा है!
प्यार, जिसे हर कोई पाना चाहता है!
प्यार, विश्वास और एतबार है!
प्यार ,ज़िंदा रहने और कुछ पाने की वजह है!
पर इस प्यार को, व्यापार बनाया किसने?
इस प्यार का गर्व मिटाया किसने?
पहले जान देकर भी ,प्यार निभाते थे लोग!
अब ये जान लेने की वजह बन गया है!
पहले इसकी कसमें 
खाके ,हर वादा निभाते थे लोग!
अब ये वादा तोड़कर, धोखे देने की वजह बन गया है!
कोई कहता है, प्यार मेरी इबादत है!
कोई कहता है ,ये तो बस वक़्त की ज़रूरत है!
कहीं पैसा देखकर प्यार होता है!
तो कहीं जिस्म का व्यापार होता है!
कहीं खून की होली खेली जाती है!
तो कहीं आंसुओं से हर शाम बीत जाती है!
ये कलयुग का प्यार, कोई समझ न पाया!
 दिल मे बस प्यार का जूनून है छाया!
जो समझ गए, वो अभी भी साथ है!
जो न समझे, वो कहाँ आबाद है?
प्यार भी अब एक -दो -तीन  हो चुका है!
पहले एक था, अब एक्स(EX)  हो गया है!
शर्म आ रही होगी प्यार को खुद पर,
इसे पवित्र और साफ़ ही रहने दो!
प्यार तो प्यार है, इसे प्यार ही रहने दो!

 -  रेखा रुद्राक्षी।


मेरा हौंसला! (कविता -संग्रह -"फड़फड़ाती उड़ान !"/कवियत्री -रेखा रुद्राक्षी !),


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मेरा हौंसला!

हर रास्तें पर, 
अकेले ही कदम बड़ाया हैं हमनें !
हर मंजिल को खुद ही पाया हैं हमनें !
आगे बड़तें रहने का हौंसला हैं ,
और गिरके संभलनें की आदात हैं मुझे !
इसलिये अपना हर सपना, 
दूसरों के दम पर नहीं ,
अपने ही हुनर से ,
पूरा करने का जोखिंम उठाया हैं हमनें !
रिश्तों की कमी नहीं, 
दोस्तों का भी प्यार साथ हैं !
पर फिर भी किसी को अपना सहारा ,
नहीं बानाया हैं हमनें !
य़े दुनिया हैं मेरे दोस्तों! 
कब कौन बदल जायें 
किस मोड़ पर !
इसलिये हर रिश्ते को,
 बड़ी ईमान्दारी से निभाया हैं हमने !

- रेखा रुद्राक्षी।



कुछ ख़ास लम्हें! (कविता -संग्रह -"फड़फड़ाती उड़ान !"/कवियत्री -रेखा रुद्राक्षी !),


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कुछ ख़ास लम्हें!

अक्सर तेरे चेहरें पर, खुशी देखी हैं हमने!
पर उन्हीं आंखों में, नमी देखी हैं हमने!
जब भी बैठे तेरे करीब, हम रुबरु होके,
तेरी मुस्कुराहट में भी,
कुछ कमी देखी हैं हमने!
तुमने बेशक मुझे अपना राजदार न बनाया!
पर तेरी निगाहों से, तेरी हर अधूरी कहानी
पड़ी है हमने!
तुम चले गए मुझे तन्हा करके ,
इस जिंदगी में!
पर आज भी तेरी वफ़ा के चर्चे सुने हैं हमने!
मुझे ,तुझसे और वक्त से,
कोई शिकायत नहीं!
कुछ पल ही सही ,पर उम्र-भर खुश रहूँ मैं!
ऐसे खास लम्हें दिए हैं तुमने!
ऐसे खास पल दिए हैं तुमने!!

- रेखा रुद्राक्षी।

रोशनी! (कविता -संग्रह -"फड़फड़ाती उड़ान !"/कवियत्री -रेखा रुद्राक्षी !),


C:\Users\User.pc\Downloads\rekha sharma poetry3\11.1.jpg

रोशनी!

अकेले जिन्दगी का सफर कटता नहीं!
पर ये भी सच है हर कोई,
हमसफ़र बनता नहीं!
क्या हुआ जो 
जिन्दगी तन्हा कट रही?
क्या अकेला दिया, 
कमरे को रोशन करता नहीं?
तेरी कमी ,
आज़ फिर आंखों में 
नमी- सी लगती है!
आज़ फिर तेरी 
कमी- सी लगती है!
वफ़ा करके भी क्यूँ ,
हम तन्हा रह गये?
दुनिया में हो गई, 
मोहब्बत कि कमी- सी लगती है!

- रेखा रुद्राक्षी।

बेवफा वक़्त! (कविता -संग्रह -"फड़फड़ाती उड़ान !"/कवियत्री -रेखा रुद्राक्षी !)


 C:\Users\User.pc\Downloads\rekha sharma poetry3\10..jpg

बेवफा वक़्त!

अकेलें जिन्दगी का सफर काट लेतें!
मुस्कुरातें हुए, हर पल बीत जाता!
यूँ तन्हाइयों की आदत न होती!
जो तू मेरा हमसफ़र बन जाता!
शिकायतें करें भी तो किससे?
न तुम बेवफा, न हम बेवफा!
बस, ये बेवफा वक्त बदल जाता!
दास्तां- ए- ज़िन्दगी,
हर दर्द कि दास्तां तुम्हारी है!
फिर भी मेरे सब्र का इम्तिहान जारी है!
अकेले सफर कट रहा हैं जिन्दगी का!
और किस्मत की भी कुछ लाचारी हैं!
हम मुस्कुरा रहे हैं अपने हालातों पर!
और दुनिया समझी, 
मेरे पास खुशीयां   सारी है!

- रेखा रुद्राक्षी।

कुदरत का कहर!(कविता -संग्रह -"सुलगती ख्वाइशें !"/कवियत्री -रेखा रुद्राक्षी !),

कुदरत का कहर! दुनिया की हालत गंभीर बड़ी है , मुसीबत में हर किसी की जान पड़ी है। कस रहे शिकंजा राजनीति वाले , और...